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वो अधूरी मुलाकात और हमारी खामोशियाँ

Bhawana Bhatt • Superstar Writer • Sahitya Ratna

वो अधूरी मुलाकात और हमारी खामोशियाँ

हमारा टूर 

ये बात उन दिनों की है जब हम कॉलेज में पढ़ते थे। एक बार कॉलेज के टूर से हम आगरा घूमने गए। हम नैनीताल से हल्द्वानी तक बस से आये और फिर हमें हल्द्वानी में काठगोदाम रेलवे-स्टेशन से से आगरा के लिए ट्रेन पकड़नी थी।

 

हम दिन में नैनीताल से दोपहर बाद चले और दो घण्टे बस का सफर करने के बाद हम काठगोदाम रेल्वे स्टेशन पर पहुँच गये। हम 25 छात्र और हमारे साथ दो प्रोफेसर और एक हेल्पर भैय्या भी साथ में थे।

 

हममे रेलवे-स्टेशन के अंदर जाकर अपना सारा सामान एक जगह पर रख दिया और हम लड़कियाँ वहीं पर एक बैंच में बैठ गयीं।  लड़के इधर – उधर घूम रहे थे। कुछ देर बाद मैंने महसूस किया कि हमारी सामने वाली बैंच में दो लड़के बैठे थे। और वे हमारी ओर ही देखे जा रहे थे। मैंने देखा कि उसमें से एक लड़का लगातर मुझे ही देखे जा रहा है। मैं जैसे ही उसकी ओर देखती वह दूसरी ओर देखने लगता। मैं जब अपना मुँह दूसरी ओर करती तो वह फिर मुझे देखने लगता।

 

उसकी आँखों में पता नहीं कैसी कशिश थी कि मैं भी बार – बार उसकी ओर देखने लगी। कुछ देर बाद वह हल्के से मुस्कुरा दिया। मेरा दिल जोर से धड़कने लगा और मेरी ह्रदय गति बढ़ने लगी। तभी ट्रेन आने का हूटर बज गया और हम सब जल्दी – जल्दी अपना समान उठाने लगे। ट्रेन आयी और हम सब अपने डिब्बे में चढ़ गए।

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ट्रेन में चढ़ने के बाद हम अपना समान ऊपर की बर्थ में रखने लगे ताकि नीचे की बर्थ में हम सब बैठ सकें। मैं अपना बैग ऊपर रखने की कोशिश कर रही थी।

पर ऊपर की बर्थ मेरी हाईट से ज्यादा ऊँची थी। तब मैंने अपने साथ के लड़कों को अपनी मदद करने के लिए आवाज दी। जब तक वे मेरे पास आते किसी ने पीछे से आकर मेरा बैंग पकड़ कर ऊपर की बर्थ में रख दिया।

 

मैंने जब पीछे पलट कर देखा तो वह वहीं रेलवे-स्टेशन वाला लड़का था। मैंने सर नीचा करके उसे थैंक्स कहा और अपनी सीट पर आकर बैठ गयी। फिर हम सब लोग अपनी अपनी जगह पर बैठ गए।

 

रात में हम लोग खाना खाकर अपनी अपनी बर्थों में सोने चले गए। मेरी बर्थ सबसे नीचे वाली थी यानी कि लोवर बर्थ। मुझे नींद नहीं आ रही थी फिर भी मैंने अपनी आँखें बंद कर रखी थी और चुपचाप लेटी हुयी थी। कुछ देर बाद जब मैंने अपनी आँख खोली तो देखा मेरी सामने वाली बर्थ के ऊपर वाली बर्थ यानी मेरे सामने वाली रो की मिडिल बर्थ पर वही लड़का लेटा हुआ था और मुझे ही निहारे जा रहा था।

 

हम दोनों की नज़रें मिली तो इस बात मैंने भी उसकी मुस्कराहट का उत्तर मुस्कुरा कर दे दिया। फिर पूरी रात हम एक दूसरे को देखते रहे। सुबह चार बजे हम आगरा फोर्ट रेलवे-स्टेशन पहुँचे। हम सब लोग उतर गए उसने मेरा समान अपने समान के साथ नीचे उतार दिया। तब तक उसका दोस्त भी नीचे उतर कर आ गया। और वे दोनों बाहर को जाने लगे। मैं पीछे से उसे ही देख रही थी। तभी वह एकदम से पीछे मुड़ा और उसने हाथ हिला कर मुझे बाय कहा और फिर अपने दोस्त के कन्धे पर हाथ रखकर प्लेटफॉर्म से बाहर चला गया। मैं उसे ही देखे जा रही थी। तभी प्रोफेसर सर ने हमसे समान उठा कर चलने के लिए कहा और हम भी अपना समान उठा कर होटल की ओर चल दिये।

 

वो लड़का कौन था कहाँ रहता था मुझे कभी मालूम नहीं चला और फिर ना कभी उससे मुलाकात ही हुयी। वो हमारी अधूरी मुलाकात ही थी। क्योंकि उसके बाद हम कभी नहीं मिले और ना हमने एक शब्द की एक – दूसरे से बोला। क्योंकि हमारी शर्म और हया ने हमें बात करने की इजाजत नहीं दी। और हम ने वह पूरा सफ़र खामोशियों में ही गुजार दिया।  धन्यवाद

Bhawana Bhatt 

स्वरचित और मौलिक रचना

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Author

Muktika Sahityakar